Friday, 12 June 2020

"कभी आ"(KABHI AA )


ये मंज़र है या हादसा है कोई,
क्यूँ मैं भूले से भी ना भुलता हूँ,
कुछ ऐसा हाल हो गया है मेरा तेरे बिन,
आग ठंडक दे रही है बारिश में झुलसता हूँ,
रिश्ता खून का नही मेरा अपना तो क्या,
हक़ीक़त ना बना पर मेरा सपना तो था,
क्यूँ रोज़ रात खुद को मार कर सोता हूँ,
तुझे सदा नही सुनती क्या मेरी,
मैं रोज़ तुझे पुकार कर रोता हूँ,
क्या अब कभी मुश्किलों में काम ना आयेगा,
मैं रुठ गया तू अब भी नही मनाएगा क्या,
तेरा शहर कब मुझे अब अपना सा लगेगा,
जो बीत गया वो कब सपना सा लगेगा,
कब तू फिर से मेरा इंतज़ार करेगा,
कब मेरी ख़ातिर तू अपना वक़्त बेकार करेगा,
कब तू फिर कहानियों में अपनी बात बताएगा,
कब तू आकर मुझे सीने से लगाएगा,
तुझे तो खबर भी नही के मेरा हाल क्या है,
एक बार पूछ तो सही मुझसे,
मुझे तुझसे शिकायतें मलाल क्या है,
कभी आ तुझे दिखाऊँ ,
नक़ाब हँसी का ओढ़ कैसा दिखता है,
तन्हाई में टूट के कैसे बिखरता हूँ,
आज भी तेरी गली से जब गुज़रता हूँ,
थोड़ा ठहरता हूँ ,तेरे घर की तरफ देख कर,
तुझे याद करता हूँ आँखों मे आँसू लिए,
खामोशी से "चौहान" अपने घर को निकल पड़ता हूँ।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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