यहाँ जब हर कोई एक दूसरे पर तोहमतें लगा रहा है,
एक शक्श मैंने देखा जो अँधेरे में रास्ता दिखा रहा है।।
ये ना किसी सियासत में है ना किसी दल का प्रमुख,
फिल्मों का खलनायक,नायक के काम कर दिखा रहा है।।
वो पैसे लेकर भी उनको घरों तक ना पहुँचा सके,
एक शक्श बिना पैसे लिए सबको घर पहुँचा रहा है।।
तुम्हारे दानराशि का उपयोग आंकड़ों में सिमट गया,
फर्क नियत का है जो बिना दान काम किया जा रहा है।।
सब सियासी खेल है अनुमति मिलना या ना मिलना,
काम इंसानियत का सियासतों को तमाचे लगा रहा है।।
पैसा इतना तो नही लगता के तुम्हे सोचना पड़ जाए,
एक विलन का काम देख रोता गरीब मुस्कुरा रहा है।।
कोई तो है "चौहान" जिसका ज़मीर ज़िंदा है यहाँ आज भी,
तभी आज "सोनू सूद" में गरीबों को भगवान नज़र आ रहा है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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