अधूरा इश्क़ , अधूरी ज़िंदगी , अधूरे हम ,
बिन तेरे मुक्कमल होते भी तो कैसे।।
माना मंज़िल पाने की चाह छोड़ दी हमने ,
तुझ जैसा कोई हमसफ़र पाते भी तो कैसे।।
अरमान जला के सब राख कर दिए इस दिल के मैंने ,
तुझ बिन कोई ख्वाब सजाते भी तो कैसे।।
अब बस तन्हाई ही तन्हाई नज़र आती है हर कहीं ,
तुझ बिन कोई महफ़िल सजाते भी तो कैसे।।
रख लिया दबा के दिल ने अपने दर्दों को ,
तुझबिन किसी को हाल-ए-दिल बताते भी तो कैसे।।
छोड़ "चौहान" मतलब की दुनिया में बेमतलब से जीना ,
मतलबी लोगों में बेमतलब इश्क़ का एहसास करवाते भी तो कैसे।।
शुभम सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

👌👌👌👌😚
ReplyDeleteThanks 😍😍
Delete👍
ReplyDeleteThanks 😍😍
ReplyDeleteCan't feel it,.your magic is missing 🌷
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