एक चेहरा देखा था एक रोज़ ,
मासुम, शरारत भरा,
नज़रों से नज़र मिली थी इस कदर,
सारा आलम गुमशुदा था,
वो था तो बेगाना कोई,
पर एक नज़र में अपना अपना सा लगा था,
बड़ी मशक्कत के साथ,
उनसे कुछ बात हुई,
पहली और आखिरी वो मुलाकात हुई,
उसके भी दिल मे अरमान थे,
मेरे भी दिल मे इश्क़ के तूफ़ान थे,
बस एक रात का ही वो फसाना था,
सुबहा दोनों को अलग हो जाना था,
ख्वाईशें दिल की थी उम्रभर साथ रहने की,
पर दोनों के पास अपना एक बहाना था,
सुबहा अखबार के एक टुकड़े पर लिखी,
उसके हाथों में एक बात रह गयी,
अधूरे इश्क़ की फिर अधूरी मुलाकात रह गयी,
बस फिर वो इस जहन में याद बनकर रह गयी,
ये मेरी मुहोब्बत की कहानी उस रात भर की थी,
"चौहान" वो मुलाकात बस लम्हात भर की थी,
अब हाथ मे कलम है , अल्फ़ाज़ों से याराने है,
अब तो पागल शायर है, कहाँ हम दीवाने है,
जो कहते है मुहोब्बत मिल जाती है,
छोड़ो, सब झूठे फ़साने हैं।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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