गहराई में दिल की तुम उतर रही हो,
इश्क़-ए-सागर में मैं डूब रहा हूँ।।
ये जिस कदर मुझे छू कर गुज़री है,
पता तेरा इन हवाओं से मैं पूछ रहा हूँ।।
तू कोई नूर तो नही खुदा का फिर क्यों,
तुझे इन हसीन वादियों में मैं ढूंढ रहा हूँ।।
ये कैसा सुकून मिला है तेरी आगोश में आकर,
धीरे-धीरे इस जहाँ को भी मैं भूल रहा हूँ।।
अब के सावन बरसे तो तुम भी लौट आना,
तेरी याद में अकेला बारिशों में मैं भीग रहा हूँ।।
कोई तो एहसास है तू मेरे इस दिल का "चौहान",
यूँही तो नही तुझे इन कविताओं में ढूंढ रहा हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:
Post a Comment