दबी हुई सी आवाज ,थोड़ी सहमी,
आँखें नम ,गला बैठा बैठा सा था,
एक रुदन सा था बातों में उसकी,
चहरे पर एक झूठी मुस्कान,
मानो लाखों बात छुपाये हुए थी,
माथे पर सिंदूर, हाथों का चूड़ा,
जैसे नई नई बिहाह के आयी थी,
अनजान था मैं उससे पर अपनापन सा था,
वो भी तो जैसे मानो कुछ बात बताना चाहती थी,
कुछ निशान थे चोट के जिस्म पर,
जिन्हें बार बार दुप्पटे से छुपा रही थी,
किसी के मान सम्मान में चुप थी,
छोटी गलती की बड़ी सज़ा पाए थी,
धुंधली ही सही बातें सब समझ आ रही थी,
पास खड़े सब्ज़ी वाले थे कुछ बहस हो रही है,
सब्ज़ी में आलू लेने थे उसे और बड़ी झिझक हो रही थी,
बार बार एक बात पूछे जा रही थी,
आलू मीठे तो नही भईया यही दोहरा रही थी,
परेशान हो सब्ज़ी वाले ने भी कहा,
एक दो मीठे निकल भी गए तो कोई बड़ी बात नही,
पर उसे ये बात असमंजस में ला रही थी,
कुछ वक्त इन्ही बातों पर उसकी आंखें छलक गयी,
गर्दन से थोड़ी चून्नी फिसल गई,
अब चोट का निशान चहरे - गर्दन पर,
साफ नजर आ रहा था,
उसकी बहस का राज़ साफ नजर आ रहा था,
बड़े रुदन स्वर में उसने कहा,
आप सामान बेच रहे हो तभी कोई बात नही है,
जैसा दिखता है वैसा समाज नही है,
अब बड़ी छोटी बात क्या है क्या समझाऊँ
कल सब्ज़ी में नमक कम था,
ये छोटी है या बड़ी बात क्या बतलाऊँ,
कांपते हाथों से आलू लिए और चल दी,
"खैर !! आप नही समझोगे",
ये उसके आखिरी संवाद थे,
अब इसे घर अंदर की बात कहो,
या समाज के हालात,
जैसा समझ आया लिख दिया,
उस वक़्त के "चौहान" ,
ये अनकहे जज़्बात थे।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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