Monday, 9 April 2018

"मेरा ना रहा" (MERA NA RAHA)


सूरज निकला तो वो रात का अँधेरा ना रहा,
आँखें जब खुली तो कोई ख्वाब मेरा ना रहा।।

देखा था जब तुझे पहली बार इन आँखों ने,
फिर कभी इनमे नींद का फेरा ना रहा।।

तूने किया जब रुख़्सत मेरे मकां-ए-दिल से,
तब से यहाँ फिर और किसी का बसेरा ना रहा।।

लिखता रहा "चौहान" यूँ जाग कर हाल-ए-दिल,
तेरी रग-रग में बहता इश्क़ कभी मेरा ना रहा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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