तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,
मैं आज भी तेरी यादों को लेकर जीता हूँ।।
हर रात तारों को गिना करता हूँ,
चाँद में तेरे चेहरे को ढूंढता हूँ,
हर रात गम के घूंट पीता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ।।
दिन भर दिल की बेचैनी बढ़ती है ,
ज़िन्दगी तेरे आने की उम्मीद में कटती है,
सदियों से में बस तेरी राह तकता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ।।
कभी ना कभी तो दीदार तेरा होगा ,
कभी ना कभी दिल को करार होगा,
ना जाने कैसे ज़ख्म ज़िंदगी के सीता हूँ।।
मेरे अल्फ़ाज़ गवाह है मेरे प्यार के,
"चौहान" की बेचैनी ओर करार के ,
तुझे अपने जिस्म में रूह की तरह रखता हूँ,
तू क्या जाने की कितना गम सहता हूँ,
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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