बेवज़ह नही ,
ये मिलना हमारा,
पास आना तुम्हारा,
बेवज़ह नही।।
दिन भर का इंतज़ार ,
तेरे लिए झूठा सही ,
मेरा वो बरसों का प्यार ,
बेवज़ह नही।।
यूँ रात-रात भर जगना,
हर दुआ में तुझे मांगना ,
बेवज़ह नही।।
ये आँखों की नमी,
ज़िन्दगी में बस तेरी कमी ,
बेवज़ह नही।।
तेरे दर्द-ओ-गम को अपना बनाना,
तुझमे खुद को जीते जाना ,
बेवज़ह नही।।
तुझे रब बना तेरी पूजा करना ,
तेरे बिना हर-पल पल-पल मरना ,
बेवज़ह नही।।
होंठो से तेरा अलफ़ाज़ बन निकलना ,
कलम से तेरा जज़्बात बन निकलना,
बेवज़ह नही।।
पढ़े होंगे बहुत मुक्कमल फ़साने महोब्बत के ,
अधूरा होके भी पूरा मेरी मुहोब्बत का किस्सा ,
बेवज़ह नही।।
आखिरी पैगाम है "चौहान" का तेरे नाम ,
तेरी हसरत में खुद को मिटा जाना ,
बेवज़ह नही।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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