ये किस्से तेरी चाहत के ,कभी तो आम होंगे ,
रंग तेरी बेवफाई के ,कभी तो शरेआम होंगे।।
कया हुआ जो आज तक सफ़र में है ज़िन्दगी,
कभी तो हासिल हमें भी मुकाम होंगे ।।
माना एक नशा सा था तेरे इश्क़ का मुझपर,
क्या हुआ तू नही इस शहर में महख़ाने तमाम होंगे ।।
कब तक जीतते रहेंगे वो यूँ दगा कर कर के ,
कभी तो हमारे हाथों में भी जीत के जाम होंगे ।।
हश्र के वक़्त कौन देगा गवाही उनकी ,
रब की अदालत में जब साबित -ए-इलज़ाम होंगे।।
कब तक यूँ छुपकर बेवफाई के बाजार चलाते रहोगे,
कभी ना कभी तो ये सब रुबरु-इ-आवाम होंगे।।
क्या हुआ "चौहान" आज इस भीड़ में गुमनाम है तो,
कभी तो इस नाम को चाहने वाले तमाम होंगे ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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