इक ख़्वाब देखा था हमने तुम्हे लेकर ,
तेरे ग़मों के बदले अपनी खुशियाँ तुम्हे देकर।।
काँटों से ही सही ,तुम मेरा आंगन तो सजा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
गुनाहों सी हो गयी है अब तो ये जिंदगी ,
सज़ा सी लगती है मुझे अब तेरी बंदगी,
माना के टूट के बिख़र चुका था एहसास तो करा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
दिन तो गुज़र जाता है ये तन्हा रात खा जाती है ,
कोशिश करता हूँ जो भूलने की तेरी याद आ जाती है ,
जाना ही था जो तुम्हे दूर कोई बहाना ही दे जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
महफ़िलों में यूं तन्हाइयों का आलम ना होता ,
दिल मे पतझड़ , आंखों में बारिशों का मौसम ना होता,
क्या होता जो मेरा अंजाम भी अपने हाथों से लिख जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
नफ़रत तुमसे नही मुहोबत से हो गयी है ,
मौत ख़्वाईश नही ज़रूरत सी हो गयी है ,
अपने इस दीवान-ए-मुहोब्बत को जीना तो सीखा जाते,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
ज़मता लहू शायद मेरा फिर से खौल जाता ,
बेज़ुबाँ लबों से "चौहान" कुछ तो बोल पाता ,
मेरी कब्र पर मिलने आज तो बेहिज़ाब आ जाते ,
क्या होता जो घड़ी भर को ,तुम लौट के आ जाते ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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