ऐसा क्या हुआ की फिर कभी वो लौट के ना आया ,
चेहरा दिखाना दूर साया तक भी नज़र ना आया ।।
दिल में तो उसके भी कुछ अरमान थे ,मंज़िल थी मुकाम थे ,
हमसफ़र बनना तो दूर वो तो राहगीर बन रास्तों में भी नज़र ना आया ।।
मिन्नतें भी बहुत की थी हमने सज़दे भी बहुत किये थे लेकिन,
ऐसा क्या हुआ की खुद को खुद में नमाज़ में बैठा कोई काफ़िर नज़र आया ।।
सुकून भी मिला था और ज़ख्मों पर मरहम सा लगा था छूना उसका ,
फिर ऐसा क्या हुआ की उसका दिया हर ज़ख़्म हमें नासूर नज़र आया ।।
लिखे तो बहुत थे फ़साने मेरे बाद भी उन्होंने मुहोब्बत के "चौहान",
ऐसा क्या हुआ फिर कभी पैग़ाम-ए-मुहोब्बत में मेरा नाम नज़र ना आया ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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