Saturday, 7 April 2018

"वो ग़ैर थे" (WO GAIR THE)


वो ग़ैर थे जो अपनेपन का एहसास दिलाते थे ,
वो ग़ैर थे जो हर पल साथ साये से नज़र आते थे ।।

मुहोबत भी झूठी थी , फ़साने भी झूठेे थे ,
एक फ़रेब थे वो जो सच सा नज़र आते थे।।

मंज़िल भी अलग थी हमारी रस्ते भी अलग थे,
रस्ते अनजान थे मेरे जो बस तुम तक आते थे।।

रातें भी तन्हा थी मेरे तो  दिन भी वीरान  थे ,
वो दर्द-ए-दिल थे जो दिल का चैन नज़र आते थे।।

पास भी रहना था उनके और गम भी ना सहना था,
वो एक घुटन थी जो खुला आसमान नज़र आते थे।।

क्या लिखना था और क्या बताना था "चौहान",
वो ख़ामोशी थी मेरी जो अलफ़ाज़ से नज़र आते थे ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...