Friday, 6 April 2018

"कभी तो आओगे तुम" (KABHI TO AAOGE TUM)


ये जो गलियाँ आज सुनी नज़र आती है ,
ये जो राहें ना जाने कहाँ पर ले जाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।

कैसे कहूँ और कैसे कहूँ,
जो दिल के जज़्बात है ,
आ देख एक दफ़ा आ के ,
तेरे बिन जो मेरे हालात है ,
तेरी यादें दिल में दर्द दे जाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।

तुझसे नाता मुझसे ऐसा ,
ये नाता कभी टुटा ही नही ,
तू इस कदर मिला मुझसे ,
तेरा मोह मुझसे छूटा ही नही ,
"चौहान" तेरी ख़ामोशी मुझको,
तेरे दिल का हाल सुनाती है ,
कहीं दूर तक मेरी नज़र बस तुझे ढूँढती जाती है ,
दिल से बस एक आवाज़ आती है ,
की कभी तो आओगे तुम,
लौट के इन गलियोँ में ,
कभी तो आओगे तुम।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...