ज़मी दिल की ना बंज़र होती ,
हर एक साँस ना खंज़र होती,
ये आंखें ना वीरान होती ,
ये रूह ना शमशान होती ,
'गर तुम लौट के आ जाते ।।
ज़ख़्म दिल के ना मेरे नासूर होते,
नज़रे चुराते ना 'गर तुम बेकसूर होते ,
रातों को यूं हमे खाती तन्हाई ना होती ,
तेरे दिल मे 'गर ये रुसवाई ना होती ,
गर तुम लौट के आ जाते ।।
ना ये किस्सा बाज़ार -ए-इश्क़ में शरआम होता,
ना मेरी नज़्मों में तेरा यूँ बेवफा नाम होता ,
यूँ ना मिटाता खुद अपनी हस्ती "चौहान"
मिल जाते हमे भी इश्क़-ए-सफ़र में मुकाम,
गर तुम लौट के आ जाते ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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