एक ज़िन्दगी ये भी है ,एक ज़िन्दगी वो भी थी ।
एक ज़िन्दगी तेरे बिन है , एक ज़िंदगी तेरे संग भी थी ।।
क्या हुआ रंग आज थोड़ा फीका है कल गहरा था ।
रंगत इश्क़ की तो आज भी है , और रंगत इश्क़ की कल भी थी ।।
क्या हुआ कल गुज़री तेरे संग थी , आज तारों के संग ।
रातें तो काली आज भी है और रातें तो काली कल भी थी ।।
क्या फर्क पड़ता है ख़ुशी है या किसी का गम,
आँखें नाम आज भी है और आँखें नम कल भी थी ।।
क्या हुआ कुछ मिला हमें या कुछ नही मिला ,
इबादत-ए-इश्क़ आज भी है ,इबादत-ए-इश्क़ कल भी थी ।।
क्या हुआ अगर आज हम ज़िंदा होके भी ज़िंदा नही,
साँसें तो चलती आज भी है ,और साँसें तो चलती कल भी थी ।।
और कोण पढता है "चौहान" मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ।
जज़्बात-ए-नज़म तो आज भी है ,जज़्बात-ए-नज़म कल भी थी ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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