आँखों में नमी लिए ,सहमे-सहमे कुछ जज़्बात है,
हो सकता है भुल गये तुम ,ये उन दिनों की बात है।।
रातों को ना नींद थी , दिन को ना करार था ,
एक दूजे में गुम थे हम ,इश्क़ का ख़ुमार था ।।
सदियों सा मुझको तो तेरे बिन पल पल लगता था ,
मेंरे बिन जीना तो तूझको भी सजा सा लगता था।।
अपनी हाथों की लकीरों में तुम मेंरे नाम को ढूंढा करते थे,
बैठ अकेले चाँद में हम तेरे अक्ष को देखा करते थे ।।
माना के आज खुशियों के सवेरे है तेरी ज़िन्दगी में ,
"चौहान" के लिए तो उम्र भर वो गम की काली रात है।।
कुछ वादे किये थे तुमने हाथों में हाथों को लेकर,
माना अब वो तुम्हारे लिए महज़ एक गुज़री बात है ।।
हो सकता है भुल गये तुम ,ये उन दिनों की बात है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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