आज के ज़माने में ही सही ,पर किया है मैंने तुझसे ,वो पहले जैसा प्यार,
चिट्ठियों में भेजा करते थे जज़्बात और फिर एक लंबा इंतज़ार,
दिल में बेचैनी, एक डर ,तेरे जवाब की खातिर दिल बेक़रार,
जिस्म की तो कोई बात ही नही थी वही रूह से रूह वाला प्यार,
आज के ज़माने में ही सही......
एक अरसा गुज़र जाता था तेरे दिदार की खातिर,
इबादतें होती थी एक दूजे के प्यार की खातिर ,
छुप-छुप कर ख़ामोश एक दूजे को देखा करते थे ,
आँखों ही आँखों में पहरों बातें किया करते थे ,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......
दिल से दिल को एक विश्वास का धागा बंधता था,
रिश्ते की पवित्रता तो तेरा भगवान और मेरा अल्लाह जानता था ,
जब शिकायतें कम प्यार में चाहतें ज़्यादा हुआ करती थी ,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......
जब दूर होकर भी एक दुजे के पास रहते थे ,
खुशियां और गम हम साथ मिलकर सहते थे ,
जब "चौहान" एक झलक पाकर रब का दिदार हो जाता था,
ठीक वैसा ही प्यार .....
आज के ज़माने में ही सही ......
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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