Sunday, 25 March 2018

"वक़्त"(WAQT)


वक़्त बनकर आये थे वो ,
और वक़्त की तरह निकल गए ।।

जिन आँखों में बसे थे हम,
अश्क़ बनकर उन्ही आँखों से निकल गए ।।

रूह बन कर समाये थे मेरे जिस्म में  ,
बेजान कर हमें एक पल में निकल गए ।।

ख़्याल बनकर आये थे ज़हन में ,
जज़्बात बनकर लबों से निकल गए ।।

"चौहान" मरहम बन के आये थे वो ,
 ज़ख्मो को नासूर बना के निकल गए ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...