वक़्त बनकर आये थे वो ,
और वक़्त की तरह निकल गए ।।
जिन आँखों में बसे थे हम,
अश्क़ बनकर उन्ही आँखों से निकल गए ।।
रूह बन कर समाये थे मेरे जिस्म में ,
बेजान कर हमें एक पल में निकल गए ।।
ख़्याल बनकर आये थे ज़हन में ,
जज़्बात बनकर लबों से निकल गए ।।
"चौहान" मरहम बन के आये थे वो ,
ज़ख्मो को नासूर बना के निकल गए ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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