एक रात जाग के काटी,
कुछ ख़्वाब भी संग जागे थे।
मुझसे मेरे जज़्बात कुछ,
दो चार कदम ही आगे थे ।।
ना जाने कैसी चाहत की ,
दिल में चादर बुनते थे ।
बुनी थी ये जो चादर जिनसे ,
वो तेरे इश्क़ के कच्चे धागे थे ।।
लिपटा था दिल सहमा हुआ,
जो तूने दिए उन ज़ख्मो से ।
तेरे प्यार की आग में जल गए,
कुछ ख्वाब जो मैंने पाले थे ।।
अलफ़ाज़ बन के दर्द वो ,
जब कागज़ पर उतरता है ।
नासूर मेरे ज़ख्मो पर,
मुझे मरहम सा लगता है ।।
कहाँ से लाऊँ शाम और वो ,
छिपता सूरज पहाड़ों में ।
कहाँ से लाऊँ खुशबू वो ,
फूलों और बहारों में ।।
अब ना ऐसी चाहत है ,
सब भ्रम जाल के धागे थे ।
"चौहान" सब कुछ झूठा था,
क्या कसमे थी क्या वादे थे ।।
कहती रही बस मेरी कलम ,
वो बस जिस्मों के नाते थे ।।
एक रात जाग के काटी,
कुछ ख़्वाब भी संग जागे थे।
मुझसे मेरे जज़्बात कुछ,
दो चार कदम ही आगे थे ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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