कही बैठ अकेले में वो अश्क़ बहा रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।
आती जाती हवाऐं ज़ुल्फों को छु कर गुज़र जा रही होंगी ,
बार बार उसके चेहरे पर आ ज़ुल्फें उसे सता रही होंगी ,
अपने चेहरे से जब वो बिखरी लटों को हटा रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।
महफ़िलों का शोरोगुल जब उसे भाता ना होगा ,
उदासियों भरा आलम दूर जब जाता ना होगा ,
फिर कहाँ उसे किसी की बात सुकून दिला रही होगी ,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।
बहुत सताता होगा वो तन्हा रात का अँधेरा ,
बहुत रुलाता होगा वो दिल में मेरी यादों का फेरा,
अब कहाँ "चौहान" तेरी कलम उसे हाल-ए-दिल बता रही होगी,
फिर याद उसे मेरी आ रही होगी ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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