Tuesday, 27 March 2018

"रौनकें" (ROUNKEN)



रौनकें है बेपनाह तेरे दिल में ,
सुनसान मेरे दिल की गली है।।

ज़िन्दगी तो दोनों के पास थी मगर ,
तेरी आफ़ताब सी चमकी ,मेरी शाम सी ढली है ।।

क्या वफ़ा क्या मुहोब्बत क्या शिकवे -गिले तुमसे,
रूह कबकी मर चुकी है साँसें है जो बेवज़ह इतनी चली है ।।

अब क्या करेंगे मंज़िलों को पाकर तुम्हारे बिना ,
साथ तुम थे तो साथ ये बहार-ए-फ़िज़ा भी चली है ।।

क्या करूँ अब बना के वो रंगों की होली , दीपों की दीवाली,
मेरी चिता के साथ मेरे अरमानों की तो राख भी जली है ।।

तू ना मिला बाकी सब मिला इस ज़िन्दगी में "चौहान",
तेरी कमी तो मुझे आते जाते हर सांस में खली है ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...