Wednesday, 28 March 2018

"फिर कहाँ वो " (PHIR KAHAN WO )


ना पहले जैसे हम रहे , ना पहले जैसे तुम होगे,
अब कहाँ वो फिर पहले जैसे हालात होंगे।।

चलना तो आज भी है उन्ही रास्तों पर ,
पर कहाँ हर कदम अब वो साथ होंगे ।।

मिलेंगे लाखों हमसफ़र उनको भी हमको भी ,
पर कहाँ किसी के साथ ऐसे जज़्बात होंगे ।।

बातें तो कर लोगे आज भी पहरो किसी से ,
पर कहाँ वो सुकूँ दिलाते एहसास होंगे ।।

लिखता रहेगा उम्र भर "चौहान" तेरे लिए ,
हम न होंगे तो कहाँ फिर बोलते ये अल्फ़ाज़ होंगे ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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