एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ,
ना किसी ने सुनी , ना किसी ने देखी,
ना कुछ पाया , ना ही कुछ खोया ,
एक ऐसा एहसास जिसमें जिया और खुद को मरा हुआ पाया ,
लबों पर हँसी, आँखों पर अश्क़ों के निशान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।
तोडूं तो टुटे ना , छोड़ू तो छूटे ना, धागा तेरे इश्क़ का ,
जैसे मैं तेरा जिस्म और तू मेरी जान,
नाम लूँ जब तेरा तो इबादत,
दीदार हो तेरा तो इनायत ,
जैसे तू मेरा खुदा ,तू ही पहचान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।
जिसमें ना उसने थामा ,ना ही छोड़ा,
मंज़िल कभी मिलने नही थी रास्ता भी ना छोड़ा,
क्या मिला "चौहान" तुझे भी यूँ होके बेज़ुबान,
एक उसी को चाहा, उसी को पूजा ,
उसी को माना , उसी को माँगा ,
अब तो वो ही मेरा घर मंदिर वो ही शमशान,
एक ऐसी मुहोब्बत-ए-दास्ताँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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