ज़िन्दगी के हर पहलु को बदलते देखा है ,
उम्र को वक़्त से पहले ढलते देखा है ।।
रहने दो मुझे , मैं अकेला ही ठीक हूँ ,
मैंने वक़्त के साथ अपनों को बदलते देखा है ।।
किस बात का अभिमान है दुनिया को न जाने ,
मैंने तो पल में जिस्म को राख होते देखा है ।।
कौन कहता है यहाँ कला का कोई मोल नही होता ,
मैंने तो यहाँ लोगों के ज़मीर बिकते देखा है ।।
ये तो खेल है तकदीर का तू क्या जाने ,
मैंने तो पत्थरों पर सर झुकते देखा है ।।
ये दौर है आज का झूठी शान-ओ-शौक़त का ,
दो गज़ ज़मीन पर खून को खून से लड़ते देखा है ।।
मनाने दो जशन उनको भी बेइमानी की जीत का ,
मैंने तो किनारो पर आके कश्ती को डूबता देखा है ।।
कब तलक रहेगा "चौहान" नाम तेरा इस जहाँ में ,
मैंने तो यहाँ अच्छे- अच्छों का वजूद मिटते देखा है ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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