Monday, 4 March 2019

"तेरी दुनिया" (TERI DUNIYA)


ख़्वाब क्या मैं तो खुद को भी तोड़ चुका हूँ,
तेरा शहर क्या तेरी दुनिया भी छोड़ चुका हूँ।।

जिसमें देख खुद में नज़र आते थे तुम,
आज दर्पण वहम का भी तोड़ चुका हूँ।।

वो जो बाहें जिनमें गुज़री थी रातें मेरी,
देख उस आग़ोश को भी छोड़ चुका हूँ।।

सच कहते थे कि धागे कच्चे है प्यार के,
आ देख नाता ज़िंदगी से तोड़ चुका हूँ।।

रातभर घुमता हूँ शमशानों में "चौहान",
गला अपने सपनों का घोंट चुका हूँ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

No comments:

Post a Comment

"गुनाह"(GUNAAH)

गुनाह कितने है मेरे, मैं खुद नही जानता, मैं तेरा क्या हिसाब करूँ।। जवाब तो बात दूर की है, ये भी तो एक सवाल ही है, मैं तुझसे क्या सवाल क...