Monday, 25 March 2019

"हिसाब-2" (HISAAB-2)


एक दिन तो ख़ुदा तुझसे भी हिसाब माँगूँगा।।
कई सवाल है ज़हन में सबके जवाब माँगूँगा।।

खोल के रख देना चिट्ठा फिर अदालत में तेरी,
फिर सज़ा हो या रिहाई कौरा इंसाफ माँगूँगा।।

ज़्यादा समझ तो नही है मुझे रिश्ते नातों की,
क़र्ज़ सिर है किसी का उसका लिहाज़ माँगूँगा।।

घुट-घुट कर मर गए अरमान  मेरी खामोशियों में,
आज मेरी उन खामोशियों की आवाज़ माँगूँगा।।

कुछ रिश्ते रुहानी बेनाम ही दफ़न हो गए मेरे साथ,
हो उनका भी वज़ूद कोई ऐसे रीति-रिवाज माँगूँगा।।

इन आँखों का शैलाब ना जाने कहाँ बहा ले गया ,
जो डूब कर मर गए मेरे उन ख़्वाबों की लाश माँगूँगा।।

लाश तो बना "चौहान" पर मशानो का ना हुआ,
रास्तों का ही रहने दे मुझे अब ना कोई मुक़ाम माँगूँगा।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।


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