अभी पढ़ रहा हूँ खुद को,
सीख रहा हूँ खुद से,
जज़्बात छुपा रखे है,
अभी कुछ लिखता नही हूँ।।
तुझे जो मोल भाव करना है,
बेफ़िक्र कर इस बाजार दे,
प्यार है तो जान भी हाज़िर,
पैसों के मोल मैं बिकता नही हूँ।।
पारखी नही ,वाकिफ़ जरूर हूँ,
किरदारों से लोगों के,
हमसफर हूँ इन खाली रास्तों का ,
मंज़िलों पर अब मैं रुकता नहीं हूँ।।
वफादारी अपनो से ही नही ,
मुझे बेगानों से भी है,
हँस लेता हूँ हर एक कि खुशी में,
मतलब के रिश्ते मैं करता नही हूँ।।
विश्वास मेहनत पर रखता हूँ,
मोहताज किस्मतों का नही,
सिर झुकाता हूँ तो बस बंदगी में,
यूँ हर कहीं मैं झुकता नही हूँ।।
कहानी तो अपनी भी लिख दूँ,
पन्ने वक़्त की किताब के फिर पलट दूँ,
मुहोब्बत ईमान है मेरा"चौहान",
हर किसी के रंगत में रंगता नही हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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