आ ना एक बार फिर मस्ती करते है,
होली के रंग ज़िन्दगी में भरते है।।
फिर वो पिचकारी गुब्बारे लाते है,
फिर बाल्टी रंगों के पानी की भरते है।।
बैठा हूँ इंतज़ार में पहले की तरह बुला,
एक दूजे को गले लगा रंगों में रंगते है।।
बैठेगे फिर से छत पर धूप में थोड़ी देर,
आ ना फिर से झोलियां खुशियों से भरते है।।
फीके पड़े है रंग होली के तेरी याद के आगे,
आ ना इन यादों को हक़ीक़त में बदलते है।।
बहुत आ लिया तो ख़्वाबों में तो मेरे ,
आज आ ना हकीकत में मुलाकात करते है।।
कहाँ फिर ख़ुशियाँ, ख़ुशियाँ लगेंगी "चौहान" को तेरे बिना,
आ ना इन खुशियों का जश्न फिर एक बार करते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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