मैं आऊँगा लौट के ,
तुम विश्वास रखना,
दरवाजे खुले रखना,
मेरी राह तकना,
मैं आऊंगा लौट के.....
तेरे आँचल में मुझे फिर सोना है,
तेरे सीने से लग के फिर रोना है,
फिर सताऊँगा तुझे मैं दिन रात,
मेरे लिए फिर सारी सारी रात जगना,
मैं आऊँगा लौट के....
अपने हाथों से फिर खाना खिलाना,
लौरी मुझे फिर गा के मुझे सुलाना,
रहूँगा जब जब देर रात घर से बाहर,
मेरी फिक्र में फिर राह तकना,
मैं आऊँगा लौट के....
फिर उसी आँगन में खेलना है,
फिर तेरे पैरों के झूलों पर झूलना है,
फिर देखना है मेला तेरे कंधे चढ़ के,
मेरे लिए फिर खिलौने खरीद के रखना,
मैं आऊँगा लौट के......
फिर शरारत करके तुझे सताऊँगा,
हर पल में तेरे साथ खड़ा पाउँगा,
फिर से आऊँगा सूनी कलाई लेकर,
राखी मेरे लिए फिर तैयार रखना,
मैं आऊँगा लौट के....
फिर तेरी रातों में लौट आऊँगा,
फिर तुझे सीने से लगाऊँगा,
पूरे करूँगा ख़्वाब जो टूट गए,
मेरे नाम से नाम अपना जोड़ के रखना,
मैं आऊंगा लौट के......
फिर तुझे अपना हमराज़ बनाउँगा,
अपने सारे ख़्वाब तुझे बताऊँगा,
फिर मिलेंगे उन्हीं जगहों पर एक बार,
पहले की तरह थोड़ा इंतज़ार करना,
मैं आऊँगा लौट के....
अब ये दोस्ती तोड़ के ना जाऊँगा,
बीच राह में छोड़ के ना जाऊँगा,
मैं भी पढूंगा तेरे साथ बैठकर,
कविताओं में "चौहान" मेरा ज़िक्र रखना,
मैं आऊँगा लौट के......
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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