काश ये बात ना बताते तो अच्छा होता ,
वो चुप चाप चले जाते तो अच्छा होता ।।
हम तो समझ गए थे कि हमारे नही अब वो,
वो ये एहसास ना करवाते तो अच्छा होता।।
क्या होता 'गर गुज़र जाती रातें ओर अंधेरे में तन्हाई में,
तूफानों में मुहोब्बत का दिया ना जलाते तो अच्छा होता।।
काफ़िर बन बैठे तो क्या मुसाफ़िर तो थे,
मंज़िल तुझे ना बनाते तो अच्छा होता ।।
मोहताज़ नही है हम आज भी मुहोब्बत के तेरी,
पर काश दिल पत्थर से लगाते तो अच्छा होता।।
ख्वाइशें तो ना जाने कितनी मरी थी हमारी "चौहान",
दिल-ए-ज़मी को शमशान ना बनाते तो अच्छा होता।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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