बस एक बार फिर मुझे उसी बचपन मे जीना है,
किसी का खिलौना बनना है खिलौनों से खेलना है।।
एक बार फिर माँ के आँचल में सोना है,
पापा के कंधे चढ़ फिर मेला देखना है।।
वो परेशान भी करना है शरारतों से अपनी,
दादा- दादी से फिर उन कहानियों को सुनना है।।
फिर से वो असली मुस्कान चहरे पर लानी है,
फिर कुछ पाने के लिए झूठ-मुठ का रोना है।।
चलना सीखना है फिर से पकड़ के उंगली पापा की,
माँ गा के सुलाती थी जो उन लौरियो को सुनना है।।
बिन बात हँसना है तो बिन बात रोना है,
फिर एक बार उस बेफिक्री में मस्त होना है।।
फिर ज़िद्द करनी है वो नानी घर जाने की,
फिर मामा के साथ जा कर खिलौने लेकर आना है।।
एक बार फिर उस हक़ीक़त से गुजरना है,
जैसा अंदर से हूँ "चौहान" वैसा ही बाहर दिखना है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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