शोहरत भी कहाँ आसान है,
नाम से ज़्यादा नाम बदनाम है,
हक़ीक़त लिखने की बात करते है,
हकीकत यहाँ पढ़ता कौन है,
हर किसी ने छुपा रखा है चेहरा अपना,
असली चेहरा लेकर मिलता कौन है,
बात करते है असूलों की ,
पर असूलों पर चलता कौन है,
यूँ तो साथ पूरी दुनिया है मेरे,
पर वक़्त आने पर साथ मिलता कौन है,
रिश्ते अब मज़बूरी रह गए है,
जो है वो मतलब से निभा रहे है,
ज़ुबाँ पर शहद लिए फिरते है लोग,
जहाँ काम पड़े वहाँ स्वाद चखा रहे है,
वो दिल से रिश्ते निभाता कौन है,
बेमतलब गले यहाँ लगाता कौन है,
अपनों से दगा कर खुद को शातिर समझते है,
सियासती खेल है हुकुमतों के "चौहान",
वरना गरीबों की बस्ती में जाता कौन है,
मुझसे मेरी औकात पूछते है लोग,
दौलत के पैमाने से मेरा रुतबा नापते है लोग,
बूँद बूँद सैलाब है मेरे हौसलों की,
अंदाज़ा उम्र से लगते है तज़ुर्बा देखता कौन है,
जरूरत नींव को नही होती आशियाने की,
बिना नींव आशियाना बना पाता कौन है,
हौसलों की उड़ान ऊँची रख बादलों से,
फिर देख तेरी मंज़िल से तुझे हिला पाता कौन है,
जिस्मों तक आकर रह गयी मुहोब्बत यहाँ,
वो पाक रूहानी रिश्ते बनाता कौन है,
कसमें,वादे,शर्म,हया इन मे वक़्त जाया ना कर,
आज तू मुहोब्बत में उसका भगवान है,
कल उसका मुर्शद-ओ-पीर कोई और होगा,
मतलब से तो लोग भगवान बदल लेते है,
बेमतलब किसी दर पे सिर झुकता कौन है,
पैसा ही हक़ीक़त है मुहोब्बत की "चौहान",
वो राधा-कृष्ण वाली रंगत चाहता कौन है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Wah... Gazab 👌👌👌
ReplyDeletethankyou so much 😍😍😍😘😘😘
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