वो शब्द जिसमे बसता ये सारा जहाँ है,
वो जिसके आगे सिर झुकाता खुद खुदा है,
वो जिसकी ममता भगवान भी ना खोना चाहे,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।
नो माह कोख़ में रख कितना दर्द उठाती है,
खुद गीले में सो हमे सूखे में सुलाती है,
अपने हिस्से की रोटी भी जो हमें खिलाती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।
सुखी रोटी भी उसके हाथ की हर स्वाद दे जाती है,
कभी कभी जो डाँट फटकार कर प्यार जताती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।
मेरी फिक्र में जिसे रातभर नींद ना आती है,
जो हर कदम पर मेरे साथ खड़ी पाती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।
जो उपवास कितने मेरी ख़ातिर कर जाती है,
जिसके पैरों में "चौहान" ज़न्नत नज़र आती है,
कुछ ऐसी ही है माँ , मेरी माँ ,हम सबकी माँ।।
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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