कितने गम है जमाने मे की कम ही नही होते,
कितने फ़साने लिखुँ ये ख़त्म ही नही होते।।
बातें कुछ दिल में रोज़ ही घर कर जाती है,
क्या सबके ज़ख़्म नासूर है जो ख़त्म नही होते।।
हर कोई इस आस में है कि फरियाद करें,
रोज़ टूटते है तारे पर कभी ख़त्म नही होते।।
जिस्मों पर आकर ही तो रुक रही है कहानी इश्क़ की,
वो कौन से रिश्ते है जो मरकर भी ख़त्म नही होते।।
जो तुझे दिया है खुदा ने क्यों उसमे सब्र नही तेरा,
क्यों "चौहान" सागर ख़्वाईशो के कभी ख़त्म नही होते।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteWow Bhai superb lines😍😍♥️😘😘😍
ReplyDeleteThanks 😍😍
DeleteHmm let me think....
ReplyDeleteTere baska na hai motte🤣
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