मजबूर थे तभी आज राहों पर आ गए,
मसला रोटी ओर निजी जरूरतों का था,
साहाब!! बेमतलब कहाँ हम जान गवा गए,
भूख से मरते कैसे देख ले औलाद को अपनी,
तभी आज पैदल शहर से गाँव की और आ गए।।
बाहर से तो पानी और थोड़ी काई नज़र आती है,
दलदल का तो उन्हें पता है जो इसमें अंदर तक आ गये।।
ये रिवायतें हम गरीबों के लिए मिली ही कहाँ है,
हम देश मे होकर भी सड़कों पर भटकते रहे,
वहाँ लोग विदेशों से अपने घरों मे आ गये,
पेट की भूख, पाव के छाले , कहाँ नज़र आये ,
हम भक्षक आप वतन के रखवाले हो गए,
ये जो लोग शराब के लिए लाइने लगा रहे है,
कोई समझाएगा ये किनकी ज़िंदगी बचा रहे है,
कह रहे है पैसे आ रहे है खातों में गरीबों के,
हकीकत में गरीब खाते खुलवा कहाँ पा रहे है,
देखा मरते हुए उनको वो जो आत्मनिर्भर बने थे,
कही पटरी तो कहीं सड़को पे कुचले जा रहे है,
कर्ज़ मिल रहा है जो कल लौटाना भी पड़ेगा,
साहूकार बन बैठे है और सहायता आर्थिक बता रहे है,
बातें आज़ बूरी लगे मेरी तो अनदेखा कर देना,
समाज का हिस्सा है समाज को आईना दिखा रहे है,
ख़ैर छोड़ो ये सब लिखकर भी क्या होगा "चौहान"
ये कोई जादू का तो खेल नही आँखो का धोखा है,
सब देख रहे है तमाशा और ख़ामोश ताली बजा रहे है।।
एक अरसे से आखिर यही सब तो होता आया है,
मिट्टी चहरे पर लगी है और हम आईना चमका रहे है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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