Saturday, 16 May 2020

"क़िताब-ए-ज़िंदगी"(KITAB-E-ZINDAGI)


मैं भुला नही हूँ, वो बीते दिनों की बात,
वो बुरे हालात ,मैं अब तक भुला नही हुँ।।

वो ख़्वाब,उम्मीद, हालात, जज़्बात,मुहोब्बत,नफरत,
दगा,साथ, सब याद है, मैं अब तक भुला नही हूँ।।

कुछ ख्वाबों को हक़ीक़त बनाने की कहानी,
कभी पानी संग रोटी,तो कभी सिर्फ पानी।।

वो सड़क पर बिताई एक अनजान शहर में रात,
वो ज़िंदगी के शिशे में नज़र आती मेरी औकात।।

वो कतरा कतरा करके हर रोज़ ज़हर पीना,
वो यारो संग हर हाल में मुस्कान लिए जीना।।

वो आठ किलोमीटर दूर साईं मंदिर से पानी लाना,
वो सारा दिन बस दो कप चाय के सहारे बिताना।।

वो काम के ख़ातिर रोज़ दर-ब-दर भटकना,
वो पहली नौकरी जैसे बंद मुकद्दर का खुलना।।

वो जो पहले बात बात पर नखरे शिकायत करना,
फिर एक रात शिकायतों को खुद में दफन करना।।

मेरी कहानी का ये एक छोटा सा किस्सा है,
पर मेरे वजूद का ये एक अहम हिस्सा है।।

छोड़ो पूरी कहानी मेरी, कभी फुर्सत में बताऊँगा,
अपने मुंह से नही ये कहानी जमाने से सुनवाऊंगा।।

अभी तलाश में हूँ उस राह की जो मंज़िल को जाती है,
पहुँचा तो "चौहान" की किताब-ए-ज़िंदगी भी सुनाऊँगा।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ

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