सियासती खेल,सियासत वालों को ही समझ आते है,
हमारा क्या है हम तो बिना किसी बात पर लड़ जाते है।।
ये ना मंदिरों में आस्था रखते है ना मस्जिद-मज़ारों में,
इंसानियत का कत्ल कर हम तो धर्मो पर लड़ जाते है।।
रोते बिलखते देखा है मैंने दिनभर खाने के लिए उसको,
शाम को फिर कैसे ये महख़ानों के दरवाजे खटखटाते है।।
कुछ घर ऐसे भी है जहाँ चूल्हा ना जला है हफ़्तो से कई,
वो कौन से ग़रीब है जिनके खाते में सरकारी पैसे आते है।।
आग लग जाती है बड़े बड़े दफ्तरों में यूँ आजकल ,
हैरान हूँ,ये दस्तावेज अमीरों के ही कैसे जल जाते है।।
कोई कुछ करे तो भी गलत ना करे तो भी गलत,
आलोचनाएं करो, हमे तो इसमें ही मज़े आते है।।
कीमत उनसे पूछो जान की जो लड़ रहे सरहद, अस्पतालों में,
अजीब तरह के लोग देखे अपने ही घरों में रहने से कतराते है।।
बचना सब चाहते है इस दलदल में फ़सने से "चौहान",
इंतज़ार है किसी और का,हम खुद उतरने से कतराते है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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