Wednesday, 6 May 2020

"ये जान" (YE JAAN)


रुक भी गया हूँ, ठहर ही तो गया हूँ,
इन रास्तों का ही तो हूँ,
किस घर की बात करते हो तुम,
इस घर मे भी तो मुसाफिरों सा ही तो हूँ,
यूँ अब बेचैनी ना बढ़ाओ,
जज़्बातों को अब और ना दहकाओ,
ये मेरे आँगन के हर फूल तेरे है,
जी चाहे उसे ले जाओ,
अब खुशियों की मुझे जरूरत नही,
इनसे तुम अपना आँगन सजाओं,
क्या करूँ ऐसा के सकूँ मिले समझ नही आता,
मेरी रूह में तो समा ही गए हो ,
तुम ऐसा करो ये जान भी ले जाओ ।।
एक बार सीने से लगा इस,
बंजर ज़मी को भी हरी कर जाओ।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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