गर मैं ना बोलूंगा तो फिर कौन बोलेगा,
ये पट्टी भर्म की आँखों से कौन खोलेगा।।
क्यों सच कहीं बिकता नही है,
क्यों सच कोई लिखता नही है,
ये मीठी मीठी बातों का दलदल,
क्यों हर किसी को दिखता नही है।।
अपने ही अपनो को लूटते है,
धागे विश्वास के फिर टुटते है,
हाँ में हाँ मिलाओ तो सब राज़ी है,
नही तो रिश्ते यहाँ टुटते है।।
रात को दिन बोलो तो सम्मान है,
आईना दिखाओ तो अपमान है,
मिट्टी में मिट्टी हो जाएगा सब,
तुझे किस बात का अभिमान है।।
क्यों अब वो साँझा परिवार नही है,
क्यों रिश्तों में अब प्यार नही है,
सब मतलब के रिश्ते है,
क्यों अब किसी पर ऐतबार नही है।।
क्यों यहां सब गर्ज़ में ही बोलते है,
क्यों सबको पैसे के तराजू में तोलते है,
सीरत कौन देख पाता है किसी की,
क्यों सब फिर सीरत का भला सही कहते है।।
क्यों अपने लिखे पर सबको अभिमान है,
क्यों कलम चंद पैसों में होती बेईमान है,
तू लिख कर बाते दिल की क्या करेगा "चौहान",
अभी तेरी उम्र ही क्या है अभी बहुत नादान है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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