थोड़ा बेचैन रहता हूँ आजकल,
पूछता रहता हूँ मैं खुद से,
मैं रुक गया हूँ या चल रहा हूँ??
अब कहीं वो नूर दिखाई नही देता,
क्या शाम की तरह मैं भी ढल गया हूँ,
बड़े पत्थर मारे है वक़्त ने काँच सी किस्मत पर,
टूट गया हूँ या बच के निकल गया हूँ??
जो ठोकरें लगी है मुझे ज़िन्दगी की,
क्या उनसे सच में संभल गया हूँ,
सोचता हूँ जागता हूँ रात भर,
ज़िंदा हूँ या ख्वाबो के साथ जल गया हूँ,
वक़्त ने तेवर बदले "चौहान" ज़िन्दगी ने रंग,
सलीक़ा वही है या मैं भी ढंग बदल गया हूँ??
कुछ पन्ने नही लिख पाया किताब-ए-ज़िंदगी के,
क्या खुद की तलाश में खुद से दूर निकल गया हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Bohat khoob
ReplyDeletethanks dear
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