Tuesday, 23 April 2019

"नज़र आ रहा है" (NAZAR AA RHA HAI)


सब अपने हाथों से छूटता नज़र आ रहा है,
एक घर था जो अब टूटता नज़र आ रहा है।।

दीवारो में भी अब दरारें दिखने लगी है ,
पौधा था तुलसी का ,सुखता नज़र आ रहा है।।

उम्र का पड़ाव है और वक़्त बीत रहा है,
आँचल माँ का अब छूटता नज़र आ रहा है।।

अज़ीब नज़ारा है आसमाँ में इस रात का,
चाँद है के घर तारों का लुटता नज़र आ रहा है।।

इन उलझनों में उलझकर रह गयी ज़िन्दगी "चौहान",
ठोकर मार खुशियों को, खुशियों की राह ताकता नज़र आ रहा है।।

वो जो रात रात भर जागा था जिन्हें मुक्कमल करने को,
खुद कब्र अपने सपनो की खोदता नज़र आ रहा है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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