सब अपने हाथों से छूटता नज़र आ रहा है,
एक घर था जो अब टूटता नज़र आ रहा है।।
दीवारो में भी अब दरारें दिखने लगी है ,
पौधा था तुलसी का ,सुखता नज़र आ रहा है।।
उम्र का पड़ाव है और वक़्त बीत रहा है,
आँचल माँ का अब छूटता नज़र आ रहा है।।
अज़ीब नज़ारा है आसमाँ में इस रात का,
चाँद है के घर तारों का लुटता नज़र आ रहा है।।
इन उलझनों में उलझकर रह गयी ज़िन्दगी "चौहान",
ठोकर मार खुशियों को, खुशियों की राह ताकता नज़र आ रहा है।।
वो जो रात रात भर जागा था जिन्हें मुक्कमल करने को,
खुद कब्र अपने सपनो की खोदता नज़र आ रहा है।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Waw... 👌👌👌
ReplyDeletethanks 😍😍😍
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