Wednesday, 3 April 2019

"मैं भी लिखता" (MAIN BHI LIKHTA)


काश मुझे भी लिखना आता,
मैं भी हाल-ए-दिल बयाँ करता।।
वो कागज़ जो ख़ाली थे तेरे इश्क़ के,
कभी स्याही, कभी अश्क़, कभी खून से लिखता।।

वो जज़्बात, ख़्यालात, जो थे तेरे खातिर,
कुछ ना रखता छुपा कर इस दिल में,
वो लफ्ज़ जो गिरफ्त में थे खामोशी के मेरे,
एक-एक अल्फाज़, गवाही मेरी मुहोब्बत की लिखता।।

हो जाने देता फिर बातें 'गर शरेआम भी होती,
सह लेते हँस कर 'गर बात सिर्फ इल्ज़ाम की होती,
वो कसमे,वादे,वो दावे मुहोब्बत में जो तूने किये थे,
समझ गया होता तो मुहोब्बत नही सियासत लिखता।।

बड़े रंगीन मौसमी मिज़ाज़ के निकले तुम,
रूत एक थी पर हर रंग में बदले तुम,
कभी दोस्त, कभी मुहोब्बत, मुझे तो समझ नही आता, पर जरूरतों पर रिश्ते बदलने की तेरी आदत ज़रूर लिखता।।

बेख़बर है वो एक उम्र गुज़री है हमने इन बाज़ारों में,
ये मोती मुहोब्बत का यूँ दर-दर नही मिलता,
वो जो नुमाइशें कर रहे है सच्ची मुहोब्बत की अपनी,
सच होती तो "चौहान" कभी "मेरी कलम- दिल की ज़ुबाँ" ना लिखता।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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