Friday, 12 April 2019

"शायरी"(SHAYARI)


शब्दों का मेल, जज़्बातों का खेल,
बातें है दिल की जो समझ पाते नही,,
मैं लिखता कभी,कभी मैं लिखता नहीं,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

लिखुँ मुहोब्बत या टूटे दिल का हाल,
खाली दिमाग मे पलते कितने सवाल,
जवाब तेरी बातों का या हिसाब जज़्बातों का,
मैं लिखता कभी ,कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

इस दुनिया के बाजार में, रिश्तों के व्यापार में,
तराज़ू झूठ के है सच यहाँ कहीं पे बिकता नही,
जिस्मफ़रोसी शरेआम यहाँ मुहोब्बत के नाम पर,
है झूठ का बोलबाला सच यहाँ क्यों टिकता नही,
मैं लिखता कभी,कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

बातें धर्म की हो या बातें जात-पात की,
असल मे हमारी सोच ही जड़ है फसाद की,
नकाबपोश, चहरे के पीछे है कई चहरे,
असली चेहरा लेकर यहां कोई क्यों मिलता नही,
मैं लिखता कभी, कभी लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

सच जानते सभी है पर मानना कोई चाहता नही,
किसी का दर्द क्या है जानना कोई चाहता नही,
फायदे और मलतब के रिश्ते ही बाकी है,
बेमतलब से बातें भी कोई अब करता नही,
मैं लिखता कभी, कभी लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

फ़लसफ़ा ये ज़िन्दगी का मुझे समझ नही आता,
अपनो से ज़्यादा यकीन दुश्मनों पर क्यों होता जाता,
क्यों बातों में हर एक के चालसाज़ी दिखती है,
इतने ही सच्चे है तो आखों से आँखे क्यों ना मिलती है,
क्यों हर चीज़ में फायदा अपना देखते है,
मतलब की दुनिया है स्वार्थ ही है मज़हब,
बिना मतलब के सिर खुदा के दर पे भी झुकता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

बाते समाज की करूँ ,चलो रहने दो आईना झूठा है,
चुनावी दौर है,सियासती जाल है,
रेगिस्तान में मिराज है ,भ्रम सबका टूटा है,
होते बलात्कार है कहते कपड़ो का दोष है,
किस किस को समझाए चलो अपनी अपनी सोच है,
दो दिन का रोष है,मातम है,सबके लिए खेद है,
ताह उम्र किसी की कब्र पे जा कोई रोता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

अपनी ख़ुशियाँ छोड़ दूसरों की खुशियों से परेशान है,
बर्बादी देख दूसरों की इनको मिलता क्यों आराम है,
हैरान हूँ मैं देख के ,के हर शक्श में अभिमान है,
चाहने वाले यहाँ बहुत कम,
मेरी कला से जलने वाले लोग तमाम है,
नुक्स निकलते है वो दूर कहीं बैठ के,
बुरे वक्त में "चौहान" क्यों साथ कोई चलता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर और मेरी बातें शायरी नही।।

किताबे हज़ारों पढ़ी पर वो ज्ञान नही,
पैसे कमाए खूब पर कहीं आराम नही,
मैं आज भी मुसाफ़िर हूँ, जहाँ रुकने को मन करे,
ऐसे मिले कभी मुझे मुकाम नही,
खुली आँखों के अंधे, जागे है पर सो रहे,
बेज़ुबाँ मज़बूर है ,ज़ुबाँ वाले ख़ामोश सब हो रहे,
सच है "चौहान" मन अब लिखने को करता नही,
मैं लिखता कभी, कभी मैं लिखता नही,
ना मैं शायर मेरी बातें शायरी नही।।


शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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