कागज़ की कस्ती पानी मे चलाने चले थे,
सागर किनारे रेत का घर बनाने चले थे,
ना लहरों का डर था ना आँधी, तुफानो का,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।
बुनते गए हम तेरे दी हुई यादों की चादर,
आ गए वापस वहाँ जहाँ आना ना था खुद भी चाहकर,
वो मोती हसीन लम्हों के धागे में पिरोने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।
काफिला बना बैठे थे हम सपनो का,
जग भुला बैठे थे तेरे संग अपनो का,
कुछ यूं तेरे इश्क़ की बेखुदी में खो जाने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।
जब साथ छूटा तेरा तब होश आया,
सब अपनी गलती नज़र अपना दोष आया,
उस खुदा की बनाई मुहोब्बत पर यकीन करके,
"चौहान" एक नई दुनिया बसाने चले थे,
तुझको पाने की चाहत में,
कुछ ऐसे अनचाहे ख़्वाब सजाने चले थे।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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