बड़ी जदोजहद से गुज़र रही है जिंदगी मेरी,
क्यों समझाऊँ लोगों को की मैं क्या लिखता हूँ।।
कुछ को कलाकार ,तो कुछ को बेरोजगार दिखता हूँ,
सोच अपनी अपनी किसी को पत्थर, किसी को इंसान दिखता हूँ।।
मैं गालिब नही पढ़ता,मातम मुहोब्बत का आस-पास देखकर,
अकेले में अक्सर "शिव" की "बिरहाँ दा सुल्तान" पढ़ता हूँ।।
लफ्ज़-लफ्ज़ में मुहोब्बत नज़र आती है मुझे अक्सर,
जब "शिव" का "माएँ नी माएँ" "एक कुड़ी जिदा नाम मुहोब्बत" सुनता हूँ।।
माना कोई वजूद नही मेरा अभी शायरों की बस्ती में ,
सूरज नही ,जुगनू हूँ अक्सर अँधेरी रात में ही दिखता हूँ।।
लोग कहते है कि बगावत की बू आती है कलम से मेरी,
आज कल लोगो का रुतबा नही, उनकी औकात लिखता हूँ।।
अगर लिखने बैठा कभी मुहोब्बत तो कलम तोड़ दूँगा,
फिर मत कहना "चौहान" के जाती ज़िंदगी की बात लिखता हूँ।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Awesome... 👌👌👌😍😙😙
ReplyDeleteThanq so much 😍😍😍😍
DeleteFabulous 😌😌
ReplyDeleteThanks alot bro 😍😍😍😍
DeleteReally like this poem......��
ReplyDelete😂😂😂 meri id mera comment mujhe hi ni pta kab hua
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