अब कहाँ काली तुम अपनी ये रात करते हो,
हम तो सो जाते है तुम्हारा इंतज़ार करते करते,
तुम ये रात भर फिर किस से बात करते हो??
ना जाने किन ख्यालो के गुम रहने लगे हो,
हमारी याद आती तो तुम बात कर लेते,
वो कौन है जिसे तुम आजकल याद करते रहते हो??
क्यूँ अब वो पहले की तरह जज़्बात नही है,
माना मिलने आ जाते हो साल में एक दफ़ा,
ये मिलना कैसा की आते ही जाने की बात करते हो??
इश्क़ दोनों ने किया था कोई सौदा तो नही,
हम किसी पिज़रें में कैद कोई पँछी तो नही,
के दिल बहला लिया और अब आज़ाद करते हो।।
अब प्यार से ज़्यादा तो गुस्सा आने लगा है तुम्हे,
कहीं साथ किसी और का तो नही भाने लगा है तुम्हे,
क्यों अब बातें कम और गलतियाँ ज़्यादा याद रखते हो??
अगर साथ मंज़ूर नही हमारा तो लौट जाएंगे हम,
अंज़ाम मौत है तो ये भी कर गुज़र जाएंगे हम,
क्यूँ इन पाक रिश्तों को तार-तार करते हो??
क्यूँ ये जिंदगी तुम्हे अब भाती नही है,
क्यूँ ये खुशियाँ तुम्हे नज़र आती नही है,
क्यूँ हर कलाम में कब्र और मशानो की बात करते हो??
कहाँ गया वो जो इश्क़ मुक्कमल लिखता था,
आजकल देखा मैंने लिखना भी तुम्हारा"चौहान"
बस मिलकर बिछड़ जाने की बात करते हो??
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

Nice written...kuch yaad aagya....
ReplyDeleteThanks ...kya yaad aagya
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