Monday, 11 May 2020

"दो आँसू" (DO AANSU)


अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है,
हर किसी के चहरे पर तो हँसी थी तब भी,
तू कौनसा दुनिया मे हँसता हुआ आया है।।

एक आदत ही तो है जो अब तक छोड़ नही पाए,
कभी माँ के आँचल तो कभी खेल खिलौनों के लिए,
दो आँसु आँखो में लाकर सब ऐसे ही तो पाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

जब रोया दूध पिलाया जब रोया सीने से लगाया,
मेरी आँखों मे आँसू कभी हक़ीक़त थे कभी शरारते,
इन आँसुओ से तो मनचाहा बचपन मे सब पाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

अब बस दौर बदला है कहानी में रवानी आ गई,
छूट गया बचपन अब जवानी आ गयी,
अब अश्क़ बहाते जरूर है पर दिखाते नही है,
अब ज़ख्मो पर मरहम छोड़ ,ज़ख्मो को ही छुपाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

अब कहाँ कुछ मनचाहा रोने से मिल जाता है,
अब कहाँ फिर वो रोना हँसी में बदल जाता है,
अब सहरा है वो आँखो के सागर सुख गए है,
तू कहाँ अकेला है "चौहान" इस दुनिया में,
जिसने खुद में खुद को दफ़नाया है,
अब आंखों में आँसू आ भी गए तो क्या,
सब कुदरत का लिखा लिखाया है।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

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