Friday, 27 March 2020

"इल्म" (ILAM)


मंज़िले ऐसे मोड़ पर आ जाएंगी,
हमें कहाँ इल्म था,
मौत ज़िंदगी से बेहतर नज़र आएगी,
हमें कहाँ इल्म था,
हमने तो मुहोब्बत इबादत्त जानी थी,
लैला मजनूं ,हीर राँझा, सबकी मुहोब्बत रूहानी थी,
पर आज फिर मुहोब्बत जिस्मानी जीत जाएगी
हमें कहाँ इल्म था,
कहाँ इल्म था के हम खुद ही,
खुद के गुनहगार हो जाएंगे,
ज़िंदगी तेरे यूँ कर्ज़दार हो जाएंगे,
यूँ बाँटते बाँटते दर्द लोगों का,
आँखें हमारी पानी पानी हो जाएंगी,
हमे कहाँ इल्म था,
रास्तों के हो गए ना कोई मुकाम आया,
सादिया बीत गयी ना कोई पैग़ाम आया,
जिस गुनाह से बचते रहे ताह उम्र,
उसी गुनाह का हमपर इलज़ाम आया,
मौत से भी बद्तर "चौहान" ये ज़िंदगानी हो जाएगी,
हमें कहाँ इल्म था।।

शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

2 comments:

  1. Aye hye Bhai kya Likha hai😘😘😘♥️♥️😘♥️♥️😘♥️😘♥️

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    1. Thanks bhai 😍😍😍😍😍♥️♥️♥️♥️♥️

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