मैं गुनहगार कहूँ तो किसे कहूँ बर्बादी का अपनी,
कुछ साज़िश अपनो की थी, कुछ फायदा बेगाने उठा गए।।
मैं जलता दीया था एक रात तो निकाल ही देता उनकी रौशनाई में,
पर वो हवाओं को ईशारा कर गए और खुली खिड़कियों का बहाना बना गए।।
उसनें ख़त भी लिखा था एक रोज़ मेरी मुहोब्बत के जवाब में,
जवाब में तो इक़रार था पर वो ख़त किसी और के हाथों में थमा गए।।
हमें पहले ही ख़बर थी के शहद में वो ज़हर मिला कर लाये है ,
वो सोचते है कि हम उनकी बातों के छलावे में आ गये।।
एक रोज़ पढ़ने बैठे वो सारे फ़साने मेरी कलम से लिखे हुए,
मेरी कब्र पर आए और बोले "चौहान" तुम तो दुनिया को किस्से झूठे सुना के आ गए।।
शुभम् सिंह चौहान
मेरी कलम - दिल की ज़ुबाँ।।

मैं गुनहगार कहूँ तो किसे कहूँ बर्बादी का अपनी,
ReplyDeleteकुछ साज़िश अपनो की थी, कुछ फायदा बेगाने उठा गए। Fabulous Bhai♥️
Thanks bro😍😍
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